Tuesday, April 6, 2010

एक सफ़र, मेरी चाह......



चलता चला मैं डगर-डगर,

रास्तों को बना लिया सफ़र,

आगे देखा तो हसीं शाम थी,

पीछे देखा मेरी चाह थी,

चाह को पाने की लत में

बढाता चला गया कदम


चलता चला में डगर-डगर,

राहें जटिल होती गयीं मगर,

साथ मेरे थी चाह, मेरी सनक,

राहें बन गयीं मेरी सरल,

मंजिल दूर थी मगर,

चलता चला मैं अपनी डगर


था गम व् ख़ुशी का सबब,

हार तो कभी जीत मिली

मुझे हर पल,

कदम-कदम अपना बढाकर,

हांसिल हुई जीत हमको कदम-कदम

आखिरकार.......

बादलों की ओट से बाहर आकर

सूरज मुस्कुरानी लगा हम पर,

कहेने लगा.......

झूंठी नहीं तेरी चाहत,

करके प्रयत्न हर दम,

हांसिल कर लिया तूने विजयपथ,

हो गया पूर्ण तेरा सफ़र

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