Tuesday, April 6, 2010

मैं.......


बुझ जाए आंधी से,

जलता रहे प्यार के आँचल में,

आज वो दीप हूँ मैं

खुशबु जुदा होने पर

मुरझा जो जाए,

अपनों की बगिया में खिला वो फूल हूँ मैं


निरंतर बदती जाए सागर की ओर,

आज वो नदी हूँ मैं,

बादलों को अपनी ओट में छिपाए,

धूप, कभी छाँव का साधन बना,

ऐसा एक अम्बर हूँ मैं


सोने-चांदी से जड़ा,

गगन को चूमता,

महेल--ताज हूँ मैं,

बेनाम नफरत,

खोफ्नाक आग का प्रतीक,

जला एक आशियाँ हूँ मैं


वंश को रोशन करने वाला,

उगता सूरज हूँ मैं,

काली घटायों के आवेश में आकर,

घरौंदा जलाने वाला,

आग का गोला भी हूँ मैं

ऐसा हूँ मैं.......





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